तकनीक बनाम क़ुदरत-अफग़ानिस्तान में आतंकी संघठन तालिबान से अमेरिका का समझौता और कोरोना वायरस!

तो जनाब फिलहाल पूरे देश में लॉकडॉउन है….मौत का दूसरा नाम बताये जा रहे कोरोना वायरस की दहशत लोगों में है…और हम आज आपसे ये पूछते हैं कि लगातार दहशत, अनिश्चितता के माहौल और मौत के ख़ौफ का कोई असर हम पर या इस दुनियां पर होगा या नहीं ..इसका कोई हल है या नहीं?
सबसे पहले तो आज आप ये समझ लें कि दुनियां में जो भी कुछ होता है वो सब कुछ अल्लाह की मर्जी से होता है। आप चाहे गॉड कहें, एक अदृश्य निराकार भगवान मानें या फिर सबका मालिक ऊपर वाला, इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
उस ही अल्लाह या गॉड की क़ुदरत के सामने विज्ञान, ताक़त, टैक्नॉलोजी और आधूनिकता बेबस हैं, हालांकि हमेशा इसके सबूत सामने आते रहे हैं लेकिन इसको समझने के लिए फिलहाल आज सिर्फ दो उदाहरण देना चाहता हूं….सबसे पहले कोराना वायरस जैसा नाम और दूसरा आधूनिक हथियारों और ताक़त के बावजूद अमेरिका और उसके सहयोगियों की अफ्गानिस्तान में नाकामी।
और हां…आज आपसे मैं न तो जेल में बंद गुजरात के आईपीएस संजीव भट्ट को लेकर कोई बात करूंगा, न ही गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में दर्जनों बच्चों की मौत के मामले के बाद चर्चा में आए जेल में बंद डॉक्टर कफील की बात करूंगा, न ही दिल्ली दंगो को भड़काने के आरोपी बीजेपी नेता कपिल मिश्रा की गिरफ्तारी के बजाए उनको सरकारी सुरक्षा की बात करूंगा, वैसे भी मैनें कभी शरजील इमाम या ताहिर हुसैन और उसके भाई की गिरफ्तारी पर सवाल नहीं उठाए हैं, आज भी नहीं करूंगा,न मैं आज गुजरात नरसंहार में मारे गये पूर्व मेंबर ऑफ पार्लियामेंट एहसान जाफरी और कई साल से इंसाफ को भटक रहीं उनकी बूढ़ी विधना की बात होगी, न ही मैं आज कुंजा कपूर, कपिल गुर्जर या गोपाल द्वारा शाहीन बाग में गोली चलाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के कथित नारे लगाने की चर्चा करूंगा, न ही आज सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर एक महिला द्वारा छेड़छाड़ के आरोपों की चर्चा करूंगा न ही ये पूछूंगा कि उनको रिटायरमेंट के बाद राज्यसभा पहुंचाने वालों ने ईनाम दिया है या फिर बाबरी मस्जिद का सौदा या रूटीन मामला है जैसे किसी दूसरे सवाल को उठाऊंगा। आज सिर्फ दो ही मामलों पर बात होगी। एक कोरोना वायरस और उसकी वजह से देश भर में लॉकडॉउन और दूसरी अफ्गानिस्तान में तालिबान से समझौते के लिए जेल में बंद कैदियों की रिहाई की ख़बर।
जो बातें आपसे होंगी, उन पर अगर आपको व्हाटसअप, टिकटॉक और एक दूसरे में बुराइया तलाशने से फुरसत मिले तो, आपके तर्क, आपके कमेंट और मश्वरे का ख़ास तौर से स्वागत है। अगर आपने अभी तक हमारे चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है तो ऊपर आपकी स्क्रीन के कोने पर बनी हुई घंटी को दबाएं और अपनी राय भी दें। दोस्तों इसमें आपका कोई खर्चा नहीं होगा। इसलिए बिल्कुल बेफिक्र रहें कि आपकी जेब से कुछ खर्च होगा।
सबसे पहले बात उस ख़बर की जो हाल ही में सामने आ रही है। अफ्गानिस्तान में तालिबान की शर्तों को मानते हुए कैदियों की रिहाई की मंजूरी दे दी गई है। अफ्गानिस्तान में आंतकवाद के नाम पर तालिबान को ख़त्म करने और जड़ से उखाड़ फेकने के लिए पिछले कई दशक से कोशिश करने वाले अमेरिका और उसके सहयोगियों ने न सिर्फ तालिबान के आगे घुटने टेकते हुए उनकी हर शर्त मान ली है, बल्कि आंतकवाद के नाम पर जेल में बंद तालिबानियों की रिहाई तक को तैयार हो गया है। ज्यादा चर्चा न करते हुंए सिर्फ इतना कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ लाखों टन बम बरसाने वाले अमेरिका और उसके कई दर्जन ताक़तवर और आधूनिक टैक्नीक से लेस देशों के एफ-16, जैसे हजारों लड़ाकू विमान, सैटेलाइट, ड्रोन, नेवी, वायू सेना, थल सेना पिछले लगभग 20 साल से उन तालिबान को खत्म करने की कोशिश में नाकाम हो गये हैं। जिनके पास न तो कोई एफ-16 या कोई भी लड़ाकू विमान ेथा, न कोई सैटेलाइट था, न ही कोई ड्रोन , न कोई टैक्नीक थी, दुनियां में उनके साथ कोई देश खड़ा भी नहीं था और तो और ख़ुद अफ्गानिस्तान में ही उनके ख़िलाफ अनेरिका के कई चहेते भी उनसे लड़ रहे थे। जिस तालिबान को शांति का दुश्मन और आतंकवादी बता कर अमेरिका और उसके 48 सहयोगी देश ज़मीन ने नेस्तोनाबूद करने का दावा कर रहे थे उन्ही तालिबान के आगे हार मानते हुए जब उन्ही से समझौता हो रहा है तो समझौते की पहली शर्त यह है कि शांति बहाली के लिए हम तालिबान से समझौता कर रहे हैं। उन्ही तालिबान की कई शर्तों में एक शर्त ये भी थी कि आंतक के झूठे आरोप जेल में बंद कैदियों को भी रिहा किया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि दुनियां के सबसे बड़ी ताकत ने दुनियां के सबसे कमजोर माने जाने वाले तालिबान की ये शर्त भी मान ली है। यानि तकनीक और ताकत के मुकाबले में वहीं हुआ जो इस दुनियां को बनाने वाले ने चाहा।
अब आते हैं दूसरे मुद्दे पर…यानि कोरोना वायरस की…
क्या लगातार दहशत, अनिश्चितता के माहौल और मौत के ख़ौफ का कोई असर हम पर पड़ता है कि नहीं…
दोस्तों ये सच्चाई है कि आपके साथ होने वाली हर घटना का असर आपके शरीर आपके व्यहार पर सीधे तौर पर न सिर्फ पड़ता है बल्कि सामने से नज़र भी आता है। आपके हाथ पर कोई चोट लगती है, आपको कोई गाली देता है, आपको कोई ईनाम मिलता है या आपको कोई जोक सुनाता है तो आपका चेहरा आपके गुस्से, नाराजगी या खुशी को बयां कर देता है। जब आप किसी दहशत या बेतहाशा गुस्से में होते हैं तो आपको पसीना, दिल तेज़ी से धड़कने लगता है, हथेली में खुजली बार बार पेशाब आना या पेट में गड़बड़ तक हो जाती है। ये सब होता है हमारे दिमाग में मौजूद एक सिस्टम की वजह से, जोकि हाइपोथेरेमस नाम का वह सूचना तंत्र है जो अल्लाह ने हमारे दिमाग में बनाया है, ताकि हमारे शरीर को खुशी, गम और डर जैसे हालात से आगाह किया जा सके। और ये भी सच्चाई है कि लगातार डर और खौफ के माहौल में हमारे शरीर पर किसी भी वैज्ञानिक तरीके या दवाई का सटीक असर नहीं होता है।
तो क्या कई दिनों से चल रहे लॉकडॉउन और लगातार कोरोना वायरस के फैलने के लगातार डर का हम पर कोई असर नहीं होगा।
इन हालात में हमको क्या करना चाहिए यह हमारे लिए और पूरी दुनियां के लिए बड़ा सवाल है।
सबसे पहले तो मैं निजी तौर पर यही कहूंगा कि डरें नहीं न ही पैनिक हों, सरकार को कोशिशों और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अपील का सम्मान और सहयोग करें। और स्वस्थ रहें। जब तक लॉकडॉउन है बाहर निकलना बंद करें। प्रशासन को सहयोग करें।
वैसे भी क्वारंटीन को इस्लाम रिकगनाज़ करता है और इतिहास के मुताबिक सबसे पहले क्वारंटीन को लेकर पैग़म्बर ए इस्लाम सल्ललाहुअलयह वसलल्म ने कहा कि अगर किसी बस्ती में कोई वबा यानि महामारी आए तो जहां जो वहीं रुक जाओ, बाहर वाला बाहर रहे अंदर न आए ला तदख़ुलु बिहा, जो अदंर हो वो बाहर न जाए। इस पर अमल का भी जिक्र है कि जब शाम में प्लेग फैला तो दो बड़े सहाबी अबु उबेदा और हज़रत माज़ बिन जबल को जब हज़रत उमर ने जान बचाने के लिए वापस आने को कहा तो उन्होने पैगम्मबर ए इस्लाम की हदीस का जिक्र करते हुए आने से इंकार कर दिया यहां तक कि दोनों का वहीं इंतक़ाल हो गया बल्कि दोनों वहीं शहीद हो गये, लेकिन उन्होने दूसरे लोगों तक इस बीमारी को फैलने से रोकने के लिए वहीं रुकना ठीक समझा।
तो हम बात कर रहे थे कि दुनियां में जो भी होता है उसका कारण और निवारण दोनों ही अल्लाह, ख़ुदा, भगवान या गॉड के पास ही है। हमारी तकनीक, हमारा विज्ञान न सिर्फ सीमित है बल्कि पूरी तरह उन्ही बातों और चीजों पर टिका हुआ है जो कि ख़ुदा की क़ुदरत ने पहले से ही बना रखीं हैं। कोरोना वायरस को लेकर बड़े से बड़ा दावा करने वाला कोई भी वैज्ञानिक कोई भी देश आज तक ये भी नहीं जान पाया है कि कोरोना तो दूर, कोई भी वायरस पैदा कैसे हुआ है और अगर मर सकता है तो मर कर जाता कहां है। इसके अलावा ये भी सच्चाई ही है कि किसी भी वायरस या बीमारी से लड़ने के लिए दवा से ज्यादा इसान की ख़ुद की प्रतिरोधक क्षमता, क़ुव्वत ए मुदाइफियत या उसका इम्मयून सिस्टम ही सबसे कारगर होता है। नहीं तो एक ही अस्पताल में, एक ही डॉक्टर द्वारा एक ही दवा से एक ही बीमारी के कई मरीजों के ईलाज के दौरान कुछ ठीक होने और कुछ के मरने की घटनाएं न होती।
तो सबसे पहले आप ये समझ लें कि बच्चे के पैदा होते ही हर तरह के टीके, वैक्सीनेशन करने और बड़े बड़े दावे करने वाले वैज्ञानिक, सरकारी तंत्र, कभी चेचक, तो कभी प्लेग, कभी कभी एड्स, कभी पोलियो तो कभी कालाज़ार जैसे बीमारियों को जड़ से ख़त्म करने की बात करते करते हर बार किसी न किसी नई ला इलाज बीमारी से जूझते ही नज़र आते हैं।
इसके अलावा किसी भी बीमारी के दारौन कोई भी दवा तब तक काम नहीं करती जब तक कि हमारा दिमाग पूरी तरह से शांति या सकून की हालत में न हो। तो क्या इस तरह के डर को ख़त्म करने नार्मल रहने के लिए हमको लगातार साइकोस्मैटिक मेडिसन, आर्टिफिशियल नींद या ट्रंकलुआईज़र जैसे टैंप्रेरी इलाज लेने चाहिएं या फिर उसी शक्ति, उसी ताक़त से मदद मांगनी चाहिए जिसने हमको पूरी दुनियां को पैदा किया है और जिसके पास हमारी हर समस्या का इलाज है। यानि दुनियां की सबसे बड़ी अदालत में अपनी अर्जी ज़रूर पहुंचाएं।
तो जनाब सब कुछ सोचने पहले इतना ज़रूर सोचें की हमसे क्या गलती हुई। अपने गिरेबान में झांके…मौत का डर दिल से निकालें और अपने रब के सामने, तवक्कल और आजिज़ी के साथ वही दुआ पड़े जो दुनियां के सबसे पहले इंसान और हमारे आपके सबके पूर्वज हज़रत आदम ने पढ़ी थी…रब्बना ज़लमना अनफुसना व इल्लमतखफिरलना, और अपने गुनाहों, जाने अनजाने में किये गये अपने पापों का प्रायचित करें।
प्रायचित की बात क्यों…क्योंकि लोगों का मानना है कि किसी भी महामारी के फैलने की बहुत सी नामालूम वजहों में सबसे बड़ी वजह हमारे अपने पाप भी होते हैं…और पाप सिर्फ वही नहीं होते जो हम खुद करते हैं बल्कि ख़ुद कुरान कहता है कि इत्तकु फितनतन ला तुसीबुनलजीना ज़लमू मिन कुम ख़ास्सा…उन लोगों पर हीं नहीं आएगी जिन्होने पाप किया हर खास ओ आम शिकार होगा… और सूर नमल…में हजरत सालेह की कौम समूद में सब बुरे नहीं थे बल्कि ज्यादा लोग खामोश रहने वाले थे।
इतिहास अगर देखें तो अभी तक लगभग 70 से 80 बड़ी महामारियां ने दुनियां को हिलाकर रख दिया था। इनमें से 1343 से 1348 के बीच चीन के ही आसपास से पैदा होने वाली बडी़ महामारी जिसको ब्लैक डेथ ऑफ प्लेग कहा जाता है , में चीन, इटली, रूस, तुर्की, क्रीमिया,यूक्रेन, स्पेन, भारत, ईरान,इंग्लैंड समेत कई देशों में लगभग 2 से 3 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। इसमें 70 परसेंट लोग यूरोप के बताए जाते हैं। इसके कारण भले ही कुछ रहे हों लेकिन कुछ इतिहासकार इस महामारी से पहले 1100 से 1200 ईसवीं के आसपास यूरोशलम को जीतने, सलीबी जंगो और जबरदस्त धार्मिक उन्माद के चलते स्पेन समेत कई इलाकों में लाखों बेगुनाह लोगों को मारने या समंद्र में डुबाने की भी चर्चा करते हैं।
अब जबकि हम आधूनिक युग में जी रहे। लेकिन आज कोरोना की चर्चा से पहले हाल के वर्तमान इतिहास की घटनाओं पर भी नज़र डालनी चाहिए। क्या हम प्रथम विश्व युद्द,सैंकेंड वर्लड वॉर, हीरोशिमा नागासाकी में बम मार कर करोड़ों लोगों को बेहद दर्दनाक मौत देना, विएतनाम, फलस्तीन, ईराक़, शाम या फिर अफगानिस्तान में ताक़त के दम पर करोड़ों लोगों को दर्दनाक मौत के कुंए में धकेलने जैसी घटनाओं को भुला सकते हैं। क्योकि इतिहास गवाह है कि इस सौ साल के दौरान इसी तरह की वारदातों में पूरी दुनियां में जितने कत्ल हुए हैं उतने इससे पहले कभी नहीं हुए।
रोजाना की ख़बरों और बड़े बड़े साइंटिस्टों के दावों से इतना तो साफ हो ही गया है कि कोरोना वायरस के लिए फिलहाल दवा के बजाय एहतियात ही इसका इलाज है।
लेकिन कोरोना को लेकर पैनिक न हों सरकार के निर्देशों का पालन करें। और कसरत के साथ ये दुआ भी पढ…

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आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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