क्या मौजूदा दौर में भी किसी जेपी की ज़रूरत है-क्या इतिहास अपने आपको दोहरा पाएगा?

नई दिल्ली (18 मार्च 2020)- कहते हैं कि इतिहास ख़ुद को दोहराता है, और ठीक 46 साल पहले की ही तरह, यानि 18 मार्च 1974 के जैसे, आज भी मार्च की तो तारीख़ 18 ही है,और साल 1974 के बजाय भले ही 2020 हो, लेकिन कुछ लोगों की नज़र में हालात कुछ इसी तरह के हैं।
जी हां 18 मार्च 1974 का वो दिन, जब भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़े आंदोलन की नई इबारत लिखी गई थी। मंहगाई, शोषण और सत्ता के नशे में चूर हुक्मरानों को नींद से जगाने और इंदिरा गांधी जैसी आयरन लेडी की राजनीतिक जड़ों को हिलाने वाले इस जन आंदोलन को लोग आज भी जेपी आंदोलन के नाम से याद करते हैं।
जेपी आंदोलन के सूत्रधार और आज़ादी के बाद देश के सबसे आंदोलन के हीरो जय प्रकाण नारायण यानि जेपी, भले ही एक आम से दिखने वाले एक्टिविस्ट हों, लेकिन उनकी राजनीतिक हुमक और जुझारू व्यक्तित्व को आज भी देश की सियासी पाठशाला का हैडमास्टर माना जाता है।
ऐसा माना जाता है कि18 मार्च 1974 यानि आज ही का वो दिन था, जब देश की सियासत के सबसे हॉट प्रदेश माने जाने वाले बिहार से जेपी, यानि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन की नींव पड़ी थी। देखते ही देखते इस आंदोलन ने तेज़ी से देशभर की राजनीति की बिसात पर ऐसा असर दिखाया कि सत्ता के नशे में मदमस्त ताक़तवर लोगों की नींव तक हिल गई। दुनियांभर में एमरजेंसी के नाम से बदनाम दौर का सबसे मज़बूती से मुक़ाबला करने वाला जेपी आंदोलन, लगभग एक साल के अंदर ही इंदिरा गांधी और उनकी राजनीतिक बिसात को उखाड़ फेंकने में कामयाब हो गया था। इतना ही नहीं जेपी आंदोलन की राजनीतिक पाठशाला से कई ऐसे नेता भी निकले जो कई दशक तक और कुछ तो अभी तक देश की सियासत का चेहरा बने रहें हैं। इनमें कभी बिहार के छात्र नेता रहे लालू प्रसाद यादव, नितीष कुमार, शरद यादव जैसे कई नाम शामिल हैं।
कहा जाता है कि बिहार में मुख्यमंत्री अब्दुल गफ़ूर और केंद्र में इंदिरा गांधी की सत्ता के ख़िलाफ लोगों में ख़ासा गुस्सा था। बिहार में ख़ासतौर से छात्रों और युवाओं में सरकार के ख़िलाफ नाराज़गी थी। साल 1974 की तारीख 18 मार्च को ही बिहार की राजधानी पटना में युवाओं और छात्रों ने सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने का फैसला कर लिया था। छात्रों के इसी आंदोलन को जब जेपी यानि जय प्रकाश नारायण का समर्थन मिला तो ये पूरे देश क्या बल्कि पूरी दुनियां के लिए जेपी आंदोलन के तौर पर आज भी याद किया जाता है। बिहार में विधानमंडल के सत्र के दौरान राज्यपाल के द्वारा दोनो सदनों के प्रस्तावित संबोधन के ख़िलाफ शुरु हुए इस आंदोलन में पटना यूनिवर्सिटी के छात्र नेता लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में छात्रों ने राज्यपाल को विधानभवन में जाने से रोकने की ठान ली थी। हांलाकि छात्रों की योजना को नाकाम करने के लिए सत्ता पक्ष के विधायक सुबह सवेरे ही वहां पहुंच गये। लेकिन एक तो विपक्षी विधायकों ने राज्यपाल के अभिभाषण का बहिष्कार कर दिया था। उधर राज्यपाल आर.डी भंडारी की गाड़ी को छात्रों ने सड़क पर ही रोक लिया। नतीजा पुलिस की लाठी चली और कई छात्र बुरी तरह घायल हो गये। लाठी और आंसू गैस के गोलों के दम पर छात्रों को दबाने की कोशिश ने आग में घी का काम किया और इधर पटना में हिंसा शुरु हुई और उधर पूरे देश की सियासत गर्मा गई। कहा जाता है कि पटना में कई छात्रों की मौत के बाद लोगों ने जेपी से आंदोलन की कमान संभालने को कहा। लेकिन जेपी ने अपनी शर्त में साफ कर दिया कि कोई भी राजनीतिक व्यक्ति या किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा नाम इसमें शामिल नहीं होगा। लोगों ने बात मानी और छात्रों ने भी अपनी अपनी पार्टियों से इस्तीफे के बाद बिहार संघर्ष समिति के नाम से बने संघठन के इस आंदोलन से जुड़ना शुरु कर दिया। आंदोलन में आने के बाद जेपी यानि जय प्रकाश नारायण ने बिहार के तत्कालीन सीएम अब्दुल गफूर से त्यागपत्र की मांग उठा दी।
उधर पूरा देश महंगाई और कई गंभीर मुद्दों की वजह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से नाराज़ था। मौक़े की नज़ाकत और सियासत की बिसात को समझते हुए जेपी ने सीधे तौर पर सत्ता के खिलाफ बिगुल बजा दिया और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक चिट्ठी लिखकर देश के बिगड़े माहौल और लोगों के गुस्से के बारे में आगाह किया। इसी दौरान उन्होने सांसदों को भी चिठ्ठी लिखी और इंदिरा गांधी के रवय्ये और देश के सामने लोकतांत्रिक खतरे से आगाह किया। जेपी ने कई प्रकार के करप्शन के लिए इंदिरा गांधी को ज़िम्मेदार ठहराया और लोकपाल बनाने की मांग की। उस ज़माने में जबकि इंदिरा गांधी की छवि आइरन लेडी वाली थी, ऐसे में जेपी ने उसी प्रधानमंत्री यानि इंदिरा गांधी के खिलाफ सीधे सियासी जंग का ऐलान कर दिया था।
उधर इंदिरा गांधी न तो अपने फैसलों से हटने के मूड मे थीं न ही किसी की सुनने को। इतना ही नहीं उन्होंने राज्यों की कांग्रेसी सरकारों को अंधिक चंदा देने और उसकी व्यवस्था करने का फरमान सुना रखा था। जिसके लिए गुजरात की चिमन भाई पटेल सरकार ने जनता से वसूली भी शुरु कर दी, और नाराज़ जनता सड़क पर आ गई। नतीजा उग्र प्रदर्शन-आंदोलन और कई लोगों की मौत। सीएम चिमन भाई पटेल के इस्तीफे की मांग के बाद आंदोलन टकराव में बदल गया। इसके बाद जय प्रकाण नारायण यानि जेपी गुजरात के जनता के साथ आंदोलन में उतर पड़े। और 5 जून 1974 को आइरन लेडी यानि इंदिरा गांधी के ख़िलाफ संपूर्ण क्रांति के नारे के साथ आर पार की सियासी लड़ाई शुरु कर दी गई।
जेपी यानि जयप्रकाश नारायण का जादू ऐसा चला कि गुजरात में सीएम चिमन बाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और देशभर में जनता सड़कों पर आने को तैयार हो गई। इतना ही नहीं देश की रेल का चक्का तक जाम हो गया क्योंकि रेलवे के लाखों कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। जयप्रकाश नारायण लगातार सरकार पर शिंकजा कसते गये और आंदोलन की धार को तेज़ करते रहे। अब जेपी ने सीधे तौर पर सरकार को हटाने के लिए आंदोलन तेज करना शुरु कर दिया। फिर देश ने वो दिन भी देखा कि जब 8 अप्रैल 1974 को जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में निकाले गये विरोध जुलूस में सत्ता के खिलाफ गुस्साई लाखों की भीड़ ने इंदिरा गांधी की सत्ता की जमीन खिसका दी। और आख़िरकार इंदिरा गांधी को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था।
सवाल वही है कि क्या मौजूदा समय में भी किसी जेपी की ज़रूरत देश को है, क्या वाक़ई इतिहास अपने को दोहरा पाएगा। (azad khalid for www.oppositionnews.com)

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आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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