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CAA देश और समाज विरोधी है तो इसका विरोध ज़रूरी है!

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CAA PROTEST IN DELHI

नई दिल्ली (18 दिसंबर 2019)-इस बीच कई बड़े डेवलपमेंट भी हुए। संसद के दोनो सदनों में सिटीजन्स अमेंडमेट बिल CAB पास होकर सिटीजन अमेंडमेट एक्ट CAA तक की मंजिल तय कर गया। लगभग दर्जन भर मुस्लिम सांसदो और नेताओं ने इसका विरोध नहीं करके बल्कि इसका समर्थन किया।
रामपुर के सासंद आज़म ख़ान का ऐसा होनहार विधायक बेटा जिनकी माता जी तक सासंद हों, उन्ही अब्दुल्ला आज़म की विधायकी चली गई। बाबरी मस्जिद पर लगभग डेढ़ दर्जन रिव्यू पिटीशन सुप्रीमकोर्ट में ख़ारिज हो गईं। जामिया और ओखला इलाके में दंगों के अलावा जामिया के स्टूडेंट्स जख्मी होकर जेल में और सुप्रीमकोर्ट में राहत तक को तरस गये। दिल्ली को मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र ओखला और सीलमपुर में आगज़नी और फसाद की चर्चा से असम की हिंसा और मौतों की ख़बरो पर कथित मुस्लिम हिसां की चर्चा हावी होती चली गई।
बात अब्दुल्लाह आज़म मियां की करें तो…एक राष्ट्रीय नेता,सियासी पार्टी के कद्दावर वक्ता, सांसद, का ऐसा बेटा, जो खुद भी विधायक और उनकी माता जी भी सासंद ! लाखों लोगों ने जिनको वोट देकर चुना था, वो अचानक रातों रात पैदल हो गये !
जी हां रामपुर के सपा सासंद आज़म ख़ान साहेब के बेटे और विधायक अब्दुल्ला आज़म की विधायकी छिनना कोई एक दिन का काम नहीं है। बाबरी मस्जिद मूवमेंट से नेता बनने और उसकी एक ईंट भी किसी ने हिला दी तो हम जान दे देंगे वाला बयान देने वाले आज़म साहेब 9 बार विघायक बने, दर्जनों मंत्रालय उनके पास थे, खुद सांसद, पत्नी सासंद बेटा विधायक, लेकिन क़ौम के लिए लड़ना या कुछ करना, सबके सामने है। सासंद महोदय पिछले कई महीने से अज्ञातवास मे हैं। दरअसल जड़ों से दूर होने वाले नेता का जो हो सो हो, लेकिन इसका नुक़सान समाज को कितना हुआ इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। क़ौंम ठगी गई, आगे वो किसी पर कैसे भरोसा करेगी ये बड़ा सवाल है।
लेकिन मौजूदा हाल में सीएए की बात करें तो जब क़ौम मुत्तफ़िक़ होकर देशहित, समाजहित में किसी मसले पर एक राय हो जाए तो हमारा फर्ज़ है कि उस कॉल को सपोर्ट करें। तो यक़ीनन नागरिकता संशोधन बिल या एक्ट को लेकर अगर पूरे देश और समाज को लग रहा है कि इसका विरोध होना चाहिए तो होना ही चाहिए। समाज और क़ौम के हर मसले पर मज़बूती से हमेशा साथ खड़े रहने वाले एक नागरिक की तरह यहां भी हमको एक होना ही पड़ेगा।
इस मौक़े पर चंद बातें भी ज़रूरी हैं। आप जब किसी केस को लड़ने या किसी के ख़िलाफ अदालत में मदद के लिए अपने वकील के पास जाते हैं तो लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक आपका वकील सबसे पहले मामले से जुड़ी एफआईआर या उससे मुताल्लिक़ काग़ज़ात आपसे मांगता है। और या तो उसी वक़्त या कुछ और समय लेकर उनको पढ़कर आपके लिए अदालत में जाने की तैयारी करता है। ठीक ऐसे ही किसी बीमारी के लिए डॉक्टर या हकीम या तो नब्ज़ देखेगा या मरीज़ का टैस्ट कराएंगा या मैडिकल टैस्ट रिपोर्ट मांगेगा।
लेकिन संसद में शाम को बिल पास हुआ सुबह को विरोध करने हम सड़कों पर उतर आए। मैं मानता हूं कि इतने लोग बिल को विरोधी बता रहे हैं तो हो सकता है कि यह देश की जनता के हित में न हो। लेकिन इसको किसने पढ़ा या समझा, ये सवाल है। देशभर में सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी 59 याचिकाएं इसके विरोध में पड़ीं जो साबित करती हैं कि यक़ीनन लोग इसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से इंकार करते हुए लगभग एक महीने बाद सुनवाई करने की तारीख दी। सुप्रीम कोर्ट में ही जामिया या दिल्ली के स्टूडेंट्स को लेकर भी एक दिन पहले कहा गया कि पहले हिंसा रोकिए फिर सुनेगें। अगले दिन कह दिया गया कि हाईकोर्ट जाइए। लेकिन क्या बाबरी मस्जिद को लेकर सत्तर साल की लड़ाई और 18 रिव्यू पिटीशन को चंद सैंकेड में ख़ारिज करने में आपको कुछ ख़ास नहीं लगता। यानि जिस मामले को सत्तर साल तक सुनने के बाद ये कहा जाए कि सत्तर साल पहले मस्जिद में जो मूर्तियां रखी गई वो अवैध थीं, वहां मंदिर को तोड़े जाने के सबूत नहीं मिला और 6 दिसंबर 1992 को कोर्ट के आदेशों को रौंदते हुए बाबरी मस्जिद को गिराना गैर कानूनी था, लेकिन बाबरी मस्जिद दोबारा यहां नहीं बनेगी, 5 एकड़ लो कहीं और बनाओं। उसी मामले पर रिव्यू पिटीशन को ख़ारिज करने को समझने के लिए आपको थोडा़ सा सोचना होगा।
आज आपकी लड़ाई आपसे ज्यादा आपके दूसरे भाई लड़ रहे हैं। बाबरी मस्जिद मुसलमानों का मामला … लेकिन वकील राजीव धवन साहब। सीएबी का विरोध असम में पहले शुरु हुआ। कई हिंदु भाइयों ने इसका विरोध आपसे पहले शुरु किया। बेहद मज़बूती से। कई ने कहा कि अब हम भी मुसलमान हो रहे हैं देखते हैं हमको कौन बाहर करेगा। कई ने कहा कि हम कोई काग़ज़ नहीं दिखाएंगे।
इस सबके बावजूद हमने सिर्फ सियासी तौर पर मरे हुए सियासी लोगों, और मरी सोच को ज़िदा करने वालों की साज़िश का हिस्सा बनकर अपने आप को लगभग सवालों के दायरे में ला खड़ा किया है।
जामिया स्टूडेंट्स में से जिन बहनों और बेटियों ने बहादुरी हिम्मत और बेबाकी का सबूत दिया.. उनको सलाम। लेकिन अगर इन्ही भाई और बहनों को कुछ वक्त और दिया जाता और ये अपनी एजुकेशन अपनी तालीम मुकम्मल करके सही वक़्त पर अपनी क़लम अपनी ताक़त का इस्तेमाल करते तो शायद नतीजे कुछ और होते।
मैं निजी तौर पर पिछले 20 साल से सिर्फ एक ही राय पर क़ायम हूं कि समाज को हमेशा या कम से कम 10 साल तक दंगो से बचना चाहिए, क्योंकि समाज को सबसे ज्यादा सांप्रदायिक दंगो से नुक़ासान पहुंचा है जबकि कुछ नेताओं और सियासी पार्टियों को इन्ही दंगो और लाशों की सियासत से फायदा। हमेशा अगर आप दंगों से बचते हैं तो एक पूरी पीढ़ी न सिर्फ शिक्षित होगी बल्कि कारोबार और दूसरे मामलों में भी मज़बूत होगी और मज़बूत सियासी सोच के दम पर सत्ता में गिस्सेदारी लेगी। क्योंकि इतिहास गवाह है कि आज़ादी से ही सत्ताधारी और विरोधी लोगों ने हर साल कई कई दंगों में समाज को न सिर्फ जान का और माल का नुक़सान पहुंचाया बल्कि उनकी राजनीतिक सोच, व्यक्तित्व, शिक्षा और सामाजिक स्तर को भी नुक़सान पहुंचाया है। एक दंगा कई साल तक वहां के लोगों को किसी भी फील्ड में संभलने नहीं देता।
जामिया या अलीगढ़ देश की, हमारी शान हैं। यहां का स्टूडेंट हमारी ताक़त है। लेकिन यहीं स्टूडेंट अगर सही समय पर अपनी शिक्षा को पूरा करके क़ौम के लिए काम करे तो शायद उसका उद्देश्य पूरा होता है। नहीं तो इस काम के लिए समाज में बेतहाशा अनपढ़ और बेक़ाबू लोगों की फौज पहले मौजूद थी ही। मदरसों के बग़ैर मुस्लिम समाज का तसव्वुर करना नामुमकिन है। लेकिन इनकी सुरक्षा और तरक्की की ज़िम्मेदारी छात्रों की नहीं बल्कि उनकी है जो इनके लिए या तो ईमानदारी से सीरियसली काम कर रहे हैं या फिर इनके नाम पर पनप रहे हैं या देश की राजनीति में शामिल होकर मजे लूट रहे हैं। अपने वजूद को बचाए रखने के लिए ए.सी ड्राइंग रूम से अपील करना और फिर छात्रों पर ज़ुल्म के बाद मदद के नाम पर फिर दुकान सजाना कई बार पहले भी देखा जा चुका है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को लेकर छात्रों को सियासत में झोंका जाना, ट्रेन से दिल्ली आने वाले छात्रों को गाजियाबाद और दादरी के पास बेताहाशा पीटा जाना और आजतक उस मामले पर घडियाली आंसू बहाने से ज्यादा कुछ न होना भी हमने देखा है। और शायद आपको भी याद हो। कांग्रेस और समाजवादियों समेत कुछ पार्टियों के कार्यकाल में अलीगढ़, मेरठ, भागलपुर, जमशेदपुर,मलियाना, मुरादाबाद, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, सीलमपुर,जयपुर,अहमदाबाद और बीजेपी कार्यकाल में गुजरात और न जाने कितने दंगों मे मारे गये लोग और उनके लिए मुस्लिम नेताओं की अब तक का निकम्मापन सबके सामने है।
कांग्रेस के पूर्व सासंद अहसान जाफरी दंगों में बेबस और मजबूरों की तरह मार डाले गये, और 17 साल से उनकी विधवा ज़किया जाफरी की बूढ़ी आंखें इसांफ को तरस रही हैं। लेकिन कोई कांग्रेसी उनसे मिलने गया हो तो बताना।
CAA अगर हमारा विरोधी है तो उसका विरोध करना चाहिए। लेकिन ये समझ कर कि कैसे हमें उससे नुक़सान है और उसका लीगली हल क्या है। ठीक वैसे ही एक लड़ाई जो अभी शुरू ही नहीं उसको आपने ज़ोर शोर से शुरु कर दिया, और बाक़ी मुद्दों पर घिरने वाले लोगों की मदद कर दी। जिन लोगों को ये जवाब देना था कि मंहगाई कैसे रुकेगी, महिलाओं की सुरक्षा कैसे होगी, रेप दर रेप कैसे रुकेंगे, जीडीपी और न जाने कितने मामलों पर उनको जवाब देना था। इसलिए नहीं कि ये मजबूत हैं बल्कि इसलिए आप और हम नेतृत्व विहीन बिना कयादद वाली वो भीड़ है जो कि जोश में तो हैं लेकिन शायद होश में नहीं।
और फिर अगर किसी के घर में दवा भी हो और डॉक्टर भी लेकिन सिरदर्द से वो परेशान हो तो उसका हाल शायद ऐसा ही है कि क़ुरान, हदीस, आप सल्लाहुअलयहिवसलल्म की हयात ए तय्यिबा और फहम की मौजूदगी में भी हम ये नहीं समझ पा रहे कि करना क्या है।
आज फिर यही कहूंगा कि भीड़ बन कर नहीं बल्कि संवैधानिक तरीक़ों से, सोच समझकर, फिर्क़ो से बाहर आकर एकजुट होकर किसी समस्या का सामना किया जाए। एक दूसरे की कमियां नहीं बल्कि अपनी कमियों को दूर करते हुए आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित करें। हो सकता है कि आपकी अच्छी सोच के लेकर भी कुछ लोग गंदी सियासत करने से बाज़ न आए लेकिन आपको देश का समाज का अपना हित सोचना है।

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About The Author

आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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