एग्ज़िट पोल के मायने और सभी दलों के लिए मंथन का समय-डराने वाली कांग्रेस हराने में नाकाम क्यों !

नई दिल्ली (20-05-2019)-

exit poll post poll survey
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आइए एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी नतीजों से हटकर ओपिनियन पोल, एग्ज़िट पोल या पोस्ट पोल सर्वे पर बात करते हैं। दरअसल इस तमाम पोल्स के नाम पर किसी की सरकार बनवा देना, किसी की गिरवा देना किसी दल को पिछड़ा हुआ बता देना कोई नई और ताज्जुब की बात नहीं है। लेकिन ये सब कुछ पूरी चुनावी प्रक्रिया और कड़ी धूप, बारिश या सर्दी में लाइन में खड़े होकर अपने उम्मीदवार को चुनने वाले वोटर का अपमान ही है। 17वीं लोकसभा के लिए चुनाव 2019 के सात चरणों के मतदान के दौरान लोकतंत्र के कई नए पहलु उजागर हुए कई राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिले। मुद्दों, मेनिफेस्टो, शिक्षा, सेहत, रोज़गार, क़ानून व्यवस्था, कल के भारत, तकनीक और ग़रीबी जैसे कई दूसरो मसलों के बजाय दूसरे के अंडरवियर का रंग बताने, हनुमान जी की जाति बताने, वोट न देने पर किसी समाज के कामों के न करने की धमकी देने और धर्ऱ्म जाति के नाम पर चुनाव भी लड़ा गया और वोट भी मांगा गया। लेकिन इस चुनाव का सबसे शर्मनाक और अफसोसनाक पहलु ये भी रहा कि जनता ने भी न सिर्फ वोट दिया भी बल्कि अपने अपने नेता को दूसरे से बेहतर बताने में पूरा ज़ोर लगा दिया। बहरहाल ये जनता और उनके प्रतिनिधियों का आपसी मामला है और फिर हमारे देश में चुनाव ऐसा आयोजन जो अक्सर होता ही रहता है। लेकिन चूंकि मामला देश की दशा और दिशा की बात है, यानि लोकसभा का गठन, इसलिए मामला गंभीर है। तो हम बात कर रहे थे एग्ज़िट पोल के नाम पर दिखाए जाने वाले वो तमाम सर्वे जो लगभग हर टीवी चैनल पर दिखाए गये। लेकिन एक तो ये कि इन एग्ज़िट पोल्स पर काफी पहले ही बैन लग गया था। इसलिए इन सभी को पोस्ट पोल सर्वे कहा जाए तो बेहतर होगा।

अगर सभी सर्वेज़ को गंभीरता से सच मान भी लिया जाए तो चुनाव खत्म होने और नतीजे आने से पहले ही सरकार के लिए तोड़ करने तमाम विपक्षियों के लिए सोचने का मुकाम है। और सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या अब कांग्रेस अपने गिरेबान में झांकने की हिम्मत जुटा पाएगी। जी हां देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी सियासी पार्टी कांग्रेस नेतृत्वको सोचना होगा कि आख़िर अपने लगातार गिरते हालत के लिए ज़िम्मेदार कौन है। इस सरकार के पांच साल के कार्यकाल में कांग्रेस को जितने मुद्दे मिले उनको लेकर कांग्रेस जनता के बीच सड़क पार जाती, तो पासा पलट सकता था।

लेकिन कांग्रेस की जनता से दूरी की तो बात दूर, ख़ुद पार्टी कार्यकर्ताओं की पहुंच अपने शीर्ष नेतृत्व तक नहीं है। सच्चाई यही है कि बीजेपी के सत्ता में रहने बाद भी वहां पर जनता के टच में रहने का सिस्टम बनाया गया, लेकिन कई साल के बदतर हालात के बावजूद कांग्रेस कार्यालय जाकर यही लगता है कि जैसे नौकरी पाने के लिए किसी कॉर्पोरेट ऑफिस में अफसरों से मिलने के लिए जद्दोजहद करनी होती है। कांग्रेस कार्यालय के हर कमरे में किसी न किसी दिग्गज का दरबार सजता है। उन तक पहुंचना ऐसा ही जैसे किसी बड़े मंत्री के दरबार तक पहुंचना। मोती लाल वोरा जी बेहद सीनियर (उम्र के लिहाज से भी) नेता है, भले ही उनसे मिलने आने वाला उनसे बात करते करते उनको सोते और नींद लेते देखता रहे लेकिन क्या मजाल है कि नेता जी के तेवर में कोई कमी आए। पार्टी को लेकर कोई राय देना भी बिल्कुल ऐसा ही है जैसे रेगिस्तान में पानी डालना। ऐसा ही हाल ज्यादातर लोगों के हैं। और तो और तो बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटा का हाल भी निराला ही है। कई पूर्व मंत्री आज भी उसी तेवर से मिलते हैं। कांग्रेस सेवादल हो या कोई दूसरा विंग सभी का हाल यही है कि जो वह कहते हैं वही सच है जनता की राय उनका फीडबैक, सब बकवास।

ये सच्चाई है कि इस चुनाव के दौरान राहलु गांधी ने न सिर्फ अपनी सूझबूझ और राजनीतिक और रणनीतिक समझ का लोहा मनवाया हो। लेकिन मिशन जितना बड़ा था उसके लिए राहुल गांधी के साथ कांग्रेस के दूसरे चेहरों की कमी बेहद खली। पहले ऐसा लगता था कि राहुल को फेल करने वाला गैंग खुद पार्टी में ही मुस्तैद है लेकिन इस बार तो ऐसा लगा कि कांग्रेस की लड़ाई अकेले राहुल गांधी की है। हांलाकि प्रियंका गांधी के आगमन से कांग्रेस और राहुल गांधी बेहद मजबूत हुए। ये भी सच है मौजूदा समय में राहुल गांधी कांग्रेस का न सिर्फ भविष्य हैं, बल्कि एक परिपक्व नेता के तौर पर बेहद निखार उनमें देखा गया। बतौर अध्यक्ष राहुल गांधी जितना कर  सकते थे, उसको पूरे नंबर दिये जाएंगे। साथ ही प्रियंका गांधी की एंट्री बेहद मजबूत रही। लेकिन राहुल के सलाहकार या रणनीतिकार कई जगहों पर चूकते रहे है। जिसका खिमयाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है।

इस बार कांग्रेस के सामने सत्ता की तरफ से काफी लूज़ बालिंग की गई, लेकिन कई मौकों पर उस पर वो शार्ट नहीं खेला गया जो खेला जा सकता था। हांलाकि राहुल के सामने न सिर्फ सत्ता को चुनौती देना, दूसरे दलों से समनव्य या मुक़ाबले के अलावा अपनी पार्टी के अंदर की काली भेड़ों को भी क़ाबू करना एक मुश्किल काम रहा।

अगर बात पोस्ट पोल सर्वे से हटकर आने वाले नतीजों की करें, तो मेरी निजी राय यही है कि बीजेपी और एनडीए भले ही सबसे बड़े दल के तौर पर उभरें लेकिन इनको 280 सीटें मिलती दिख रही हैं। उधऱ कांग्रेस और कथित यूपीए यक़ीनन दूसरे नंबर पर रहते हुए 100 तक ही जा सके हैं। लेकिन समाजवादी पार्टी से हटके बसपा की रोल भी कांग्रेस के लिए बेहद अहम रहेगा। उधर इसी सरकार में लगभग पूरा कार्यकाल तक रहने वाले चंद्र बाबू का जोड़-तोड़ भी बेहद खास है। उनका उत्साह देखकर सहज ही बातें समझ में नहीं आ रहीं। उधर ममता की मौजूदगी और उनका फाइटर मिज़ाज बेहद खास है। लेकिन केसीआर, स्टालिन और पटनायक का रोल भी खास रहेगा।

दरअसल पूरे चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने बतौर एक बीजेपी कार्यकर्ता बेहद मज़बूती के साथ न सिर्फ अपनी सरकार की बात रखी बल्कि अपनी पार्टी के लिए वोट मांगा। कोई भी क्षेत्र हो मोदी ने हर जगह मोदी बनाम ऑल करते हुए लगातार विपक्ष को न सिर्फ कड़ी टक्कर दी बल्कि जब चाहा विपक्ष को अपनी पिच पर खलेने को मजबूर किया और कई बार विपक्ष ही मुद्दों और स्लोगन्स को झटक कर उल्टा उनकी ही खिलाफ इस्तेमाल किया। मोदी और अमित शाह की सबसे बड़ी कामयाबी यही रही कि भले ही विपक्ष मोदी के खिलाफ गोलबंद रहा हो, लेकिन विपक्ष एक मत नहीं हो पाया। कर्नाटक चुनाव के बाद विपक्ष की जो तस्वीर सामने आई थी, वो लगातार बनती और बिगड़ती रही। यहां तक कि पूरे चुनाव के दौरान विपक्ष जनता के सामने ये मैसेज तक नहीं दे पाया कि उसका मुक़ाबला किससे है। बीजेपी को हराने का दावा करने वाले कई दल अक्सर आमने सामने चुनाव लड़ते नज़र आए। जिसका फायदा बीजेपी को ही मिला।

लेकिन बीजेपी की सबसे बड़ी ताक़त रही, उसका बूथ मैनेजमेंट और वोटर तक अपनी बात पहुंचा पाना। चाहे राष्ट्रवाद हो या मैं भी चौकीदार, बीजेपी जनता तक पहुंची। लेकिन राहुल गांधी ने जिस मज़बूती और सामर्थ्य से इस बार परफॉर्म किया वो भी बेहद ख़ास रहा। हांलाकि बीजेपी बनाम राहुल के चुनावी रण में एक समय ऐसा भी आया कि मामला मोदी बनाम ममता होता गया, और ममता ने साबित कर दिया कि वो आज भी बंगाल की शेरनी हैं। ये अलग बात है कि अगर ममता अपने घर से बाहर निकलकर खेलतीं तो इस चुनाव का रुख कुछ और ही होता। उधर अखिलेश यादव और मायावती भी अपने संघठन और बूथ मैनेजमेंट पर ध्यान देते तो उनके लिए और बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा सकती थी। राहुल गांधी के लिए मायावती को मनाना भी एक चुनौती रहेगी क्योंकि मायावती के एनडीए में जाने की भी अफवाहें जमकर फैलाईं जा रही हैं।

बात अगर राहुल गांधी की करें तो उनका असल इम्तिहान अब है। जबकि सात चरण का मतदान ख़त्म हो गया और नतीजे आने में तीन दिन बाक़ी है। ऐसे में अपनी बात रखकर रूठों को मनाने और बीजेपी को रोकने की उनकी कोशिश में अपने साथ किस किस को ले सकते हैं ये बड़ी बात होगी। एक सीज़ंन्ड नेता के तौर पर अगर राहुल इस चुनाव को अपनी कामयाबी की दिशा में पहला मील का पत्थर बनाना चाहते तो उनको सबसे पहले कांग्रेस की जनता और कार्यकर्ताओं से दूसरी का घटाना होगा। और अमित शाह से इतना तो सीखना ही होगा कि पार्टी के हर कार्यकर्तातक पहुंचना और पार्टी के अंदरूनी विरोधियों को कैसे सबक सिखाया जा सकता है।

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आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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