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सोहराबुद्दीन, कौसर बी, तुलसी प्रजापति जज लोया की मौत और सीबीआई की चार्जशीट फिल्मी कहानी तो नहीं?

JUDG LOYA CASE
JUDG LOYA CASE

नई दिल्ली (15 जनवरी 2018)- भले ही सीबीआई को कुछ राजनीतिक लोग सत्ताधारी पार्टी के पिंजरे में क़ैद तोते के तौर पर देखते हों। लेकिन देश की सबसे बड़ी जांच ऐजेंसी के बारे में आज भी कोई ये नहीं सोच सकता है कि सीबीआई के लोग जांच करने और अपने दायित्वों को निभाने में सक्षम नहीं है। ये भी कोई नहीं सोच सकता है कि सीबीआई अदालत में झूठ बोल सकती है। साथ ही ये भी कोई नहीं सोच सकता है कि सीबीआई किसी के दबाव में काम करती है या अपने बयान बदल सकती है।
अगर हम बात करें सीबीआई द्वारा जांच किये गये सोहराबुद्दीन मुठभेड़ और तुलसी प्रजापति मामले की। तो अदालत में दाख़िल अपनी चार्जशीट में सीबीआई ने तुलसी प्रजापति फर्जी मुठभेड़ को एक परफेक्ट मर्डर करार दिया था।। रिकार्ड्स की अगर बात करें तो दांता कोर्ट के सामने सीबीआई ने दाखि़ल अपनी चार्जशीट में प्रजापति की हत्या का मोटिव साफ कर दिया था। सीबीआई की चार्जशीट ने ही सीधे तौर पर गुजरात के तत्तालीन गृहराज्य मंत्री और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कठघरे में खड़ा कर दिया था। कई मीडिया संस्थानों के पास उपलब्ध और रिकार्ड्स में मौजूद सीबीआई की चार्जशीट में कहा गया था कि इस मामले में अमित शाह ने अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हुए अधिकारियों पर दबाव डाला था। इतना ही नहीं सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में तुलसी प्रजापति मुठभेड़ को परफेक्ट मर्डर बताते हुए दावा किया था कि प्रजापति को सिर्फ इसलिए मारा गया था क्योंकि वो सोहराबुद्दीन और कौसर बी की हत्या का सबसे अहम गवाह था। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक सोहराबुद्दीन और कौसर बी को सांगली से गुजरात पुलिस ने जब अगवा किया था उस समय वहां मौजूद तीसरा शख्स तुलसी प्रजापति ही था। अगर बात अदालत में दाखिल की गई सीबीआई की चार्जशीट की करें तो कुछ मीडिया हॉउसों मौजूद चार्जशीट के मुताबिक सीबीआई ने अदालत को ये भी बताया था कि डीजी बंजारा के कहने के बाद ही सोहराबुद्दीन और कौसर बी को अपने साथ लेकर तुलसी आ रहा था और साजिश के तहत इस दौरान तीनों को आधे रास्ते से पुलिस ने उनको उठा लिया था। अदालत में दी गई अपनी चार्जशीट में सीबीआई ने बताया था कि सोहराबुद्दीन एंकाउटर और तुलसी प्रजापति दोनों मामले एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
सीबीआई द्वारा अदालत में दी गई चार्जशीट को आज भी देखने के बाद कई अहम ख़ुलासे होते हैं। सबूत के तौर पर सीबीआई ने चार्जशीट के पेज नंबर 6 पर अमित शाह और कुछ पुलिस अधिकारियों के बीच की गई बात चीत को बेनक़ाब करने के लिए 26-11-2005 से लेकर 30-11-2005 तक की कॉल डीटेल्स को पेश किया है। जिसके मुताबिक़ जब तुलसी को अहमदाबाद कोर्ट में पेशी के लिए उदयपुर से बार बार लाया ले जाया जा रहा था, उस दौरान आईपीएस राजकुमार, डीजी वंजारा और गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री यानि बीजेपी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बीच उस दौरान काफी बातचीत हुई थी।
जिसके बाद सीबीआई ने अपनी चार्जशीट के पेज नंबर 10 और 11 में दावा किया था कि तुलसी प्रजापति को मारने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी। इतना ही नहीं सीबीआई की चार्जशीट के पेज नंबर 13 पर सीबीआई ने अदालत को बताया कि जब तुलसी को अहमदाबाद लाया जा रहा था, उस दौरान 27-11-2006 से 29-11-2006 के बीच गुजरात के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अमित शाह, गुजरात पुलिस और राजस्थान पुलिस के बीच अचानक से कई बार बातचीत होती थी। सीबीआई की चार्जशीट में इस बात का भी जिक्र था कि जब सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केस की जांच डीजी पी.सी पांडे को सौंपी तो पांडे ने आईजी गीता जौहरी के साथ मिलकर न सिर्फ अपने पद का बेजा इस्तेमाल किया बल्कि जांच में भी ढील दी थी। इतना ही नहीं जांच रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन पुलिस अधिकारी वी.एल सोलंकी ने इस मामले में अपनी रिपोर्ट 1 सितंबर 2006 को ही तैयार कर ली थी, लेकिन इस जांच रिपोर्ट को 7 जनवरी 2007 को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा गया था यानि काफी देर बाद।और तो और सीबीआई ने अपनी चार्जशीट के पेज नंबर 18 पर अदालत को बताया था कि 11 और 22 दिसंबर 2006 को गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने अपने कार्यालय में एक गुप्त बैठक भी बुलाई थी। इस मीटिंग में डीजीपी पांडे, एडिश्नल डीजीपी जी.सी रायगर, आईजी गीता जौहरी शामिल थीं। चार्जशीट के मुताबिक़ इसी बैठक में अमित शाह ने पुलिस अधिकारी सोलंकी की जांच रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए गीता जौहरी को जांच के पेपर नष्ट करने को भी कहा था। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक जीसी रायगर ने इस साजिश में शामिल होने से इंकार कर दिया था जिसके बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया था।
अदालत में दाखिल चार्जशीट में कई महत्वपूर्ण ख़ुलासे हुए हैं उनमें सीबीआई की चार्जशीट में पैरा नंबर 6.27 के मुताबिक 18 दिसंबर 2006 को तत्कालीन जांच अधिकारी वी.एल सोलंकी ने तुलसी प्रजापति से उदयपुर जेल जाकर पूछताछ की इजाजत मांगी थी। लेकिन कथित साजिश में शामिल गीता जौहरी ने इस मांग को ये कहकर टाल दिया कि उन्होंने इसकी अनुमति बड़े अधिकारियों से मांगी है। और बाद में गीता जौहरी ने बड़े अधिकारियों द्वारा पूछताछ की इजाजत नहीं दिये जाने की बात कर मिलने से मना कर दिया था। यहां तक कि गीता जौहरी ने वो चिठ्ठी भी नष्ट कर ज थी जिसमें तुलसी प्रजापति से पूछताछ की इजाजत मांगी गई थी।
और तो और अदालत में दाख़िल सीबीआई की चार्जशीट के पैरा नंबर 6.34 और 6.35 में कहा गया है कि उदयपुर जेल से आख़िरी बार जब प्रजापति को अहमदाबाद लाया जा रहा था तब भी आरोपी अधिकारी लगातार एक दूसरे के संपर्क में थे। इतना ही नहीं सीबीआई ने इनकी कॉल डीटेल्स भी अदालत को दीं था।हम आपको याद दिला दें कि 28 दिसंबर 2006 को जब तुलसी प्रजापति कंड के बाद मौका-ए-वारदात पर एक देसी रिवॉल्वर रख दी गई था। यही नहीं सीबीआई का तो ये भी कहना था कि इस मुठभेड़ में आशीष पंड्या ने खुद ही अपने कंधे पर गोली चलाई थी और मुठभेड़ में ख़ुद के ज़ख्मी होने कि कहानी बनाई थी।
ये कहानी इसलिए ज़रूरी है कि एक फिर कुछ घटनाएं बेहद ख़ास होती जा रहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट चार मौजूदा जजों ने कुछ सवाल उठाए, तो सोहराबुद्दीन मामले की जांच से जुड़े सीबीआई अदालत के जज लोया की मौत की चर्चा होने लगी। अचानक लोया के बेटे अनुज ने मीडिया के सामने आकर कहा कि उनको अपने पिता की मौत में कुछ संदिग्ध नहीं लगता। यानि एक बार फिर घूम गई और तुलसी प्रजापति, सोहराबुद्दीन, कौसर बी, जज लोया के बाद अब कई नये नाम उजागर होने लगे।
अब बात करते हैं सोहराबुद्दीन मामले की। दरअसल सीबीआई ने सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में फंसे मोदी के करीबी मंत्री, गुजरात के तत्काली गृह राज्य मंत्री और वर्तमान में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ भी चार्जशीट दाखिल कर दी थी। सीबीआई के मुताबिक़ उन पर क़त्ल, अपहरण, सबूत मिटाने, साज़िश रचने जैसे कई गंभीर आरोप लगे थे।
ऐसे में एक बार सवाल उठता है कि आख़िर ये सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामला है क्या ? किसी फिल्मी कहानी की तरह सोहराबुद्दीन एंकाउंटर मामले में भी कम मोड़ नहीं है। किसी मसाला फिल्म की तरह इसमें खद्दर, खादर, माफिया और ख़ाकी का ऐसा गठजोड़ है जिस पर एक गहरी साजिश का आरोप लगा था। सीबीआई ने दावा किया था कि वो इस साजिश की तह तक पहुंच चुकी है।
अगर सीबीआई के दावे और उसके आधार की बात करें तो कहानी के मोड़ आपके समझ में आ सकते हैं। सबसे पहले सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की। बात 26 नवंबर 2005 की जब अहमदाबाद सर्किल और विशाला सर्किल के टोल प्वाइंट पर हुई सोहराबुद्दीन की कथित मुठभेड़ हुई और सुबह तड़के ही लगभग 4 बजे इस सड़क पर अचानक कई चेहरे उजागर हुए थे। सीबीआई के मुताबिक़ गुजरात एटीएस के मुखिया डीजी वंजारा के साथ वहां आने वाले राजस्थान पुलिस के सुपरिटेंडेंट एम.एन दिनेश, कॉंस्टेबल अजय परमार को एटीएस दफ्तर के पीछे पड़ी एक हीरो होंडा मोटरसाइकिल लाने को कहा गया। जिसके बाद सोहराबुद्दीन शेख को भी वहां लाया गया था। सीबीआई जांच में कहा गया था कि सोहराबुद्दीन को चलती कार से नीचे धक्का देकर सड़क पर गिरा दिया गया था और चार पुलिस इंस्पेक्टरों ने अपने सर्विस रिवॉ़ल्वर से सोहराबुद्दीन पर आठ गोलियां दाग दीं थीं। जिसके बाद वंजारा ने कांस्टेबल परमार से सोहराबुद्दीन के निर्जीव शरीर को सिविल अस्पताल ले जाने को कहा था।
अब सवाल उठता है कि आख़िर सोहराबुद्दीन को मारा क्यों गया था। सवाल ये भी उठता है कि आख़िर एक आम सा गैंगस्टर इतना बड़ा कैसे हो गया कि उसकी गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह की दुश्मनी हो गई थी? दरअसल इस कहानी का राज़ गुजरात और राजस्थान में मौजूद अरबों की मार्बल लॉबी में छिपा है । जांच में ये बात सामने आई थी कि सोहराबुद्दीन आईपीएस अभय चूड़ास्मा के इशारे पर इस मार्बल लॉबी से करोडों का चौथ यानि उगाही वसूल रहा था। इस मोटी रक़म का एक बड़ा हिस्सा चूड़ास्मा तक जाता था। आरोप है कि गुजरात और राजस्थान की मार्बल लॉबी ने सोहराबुद्दीन की वसूली से तंग होकर गुजरात के तत्कालिक गृह राज्य मंत्री अमित शाह से संपर्क किया था। कहा ये भी जाता है कि यही लॉबी गुजरात और राजस्थान में राजनीतिक पार्टियों के लिए मोटा चंदा दिया करती थी। ऐसा आरोप है कि अमित शाह ने अभय चूड़ास्मा से सोहराबुद्दीन को रास्ते से हटाने के लिए कहा लेकिन शायद अमित शाह अंदर की सच्चाई से अंजान थे कि जिस गैंगस्टर को वो रास्ते से हटवाना चाहते हैं वो दरअसल अभय चूड़ास्मा का ही पैदा किया हुआ था।
इसके बाद सोहराबुद्दीन को फांसने की तैयारी हुई जिसके तहत राजस्थान में कहीं छिपे बैठे सोहराबुद्दीन को गुजरात लाना था। कहा जाता है कि उसे गुजरात में किसी नए इल्जाम में फांसने की साजिश बुनी गई थी। इसके लिए कहा जाता है किअभय चूड़ास्मा ने ही सोहराबुद्दीन को लालच दिया था। जिसमें रमण पटेल नाम के एक कारोबारी से पैसे ऐंठने के बहाने उसे गुजरात बुलाया गया था। जांच में सामने आया था कि इसके बाद सोहराबुद्दीन ने उगाही के लिए अपने दो गुर्गों सिलवेस्टर और तुलसी प्रजापति को भेजा था। दोनों ने पॉपुलर बिल्डर के मालिक रमण पटेल पर गोली चलाई और सोहराबुद्दीन के खिलाफ नामज़द रिपोर्ट दर्ज हो गई। जिसके बाद कहा जाता है कि सोहराबुद्दीन को शक हो गया था कि अभय चूडास्मा उसके साथ डबल क्रॉस कर रहा है। जिसके बाद वो एक साल के लिए गायब हो गया था। पुलिस ने एक बार फिर लालच का फंदा फेंका और सोहराबुद्दीन का दूसरा साथी तुलसी प्रजापति उसमें फंस गया। कहा जाता है कि तुलसी सोहराबुद्दीन से दगा करने और उसका पता देने को तैयार हो गया था।
आरोप है कि पुलिस का खेल जारी था। और फिर आई 22 नवंबर 2005 की वो रात, जब गुजरात एटीएस और राजस्थान पुलिस की टीम ने आंध्र प्रदेश एसआरटीसी की हैदराबाद से सांगली जाने वाली एक बस को सांगली के पास रोका था। जांच के मुताबिक़ सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसी प्रजापति इसी बस में थे। इन्हें पकड़ा गया और दो दिन के तैयारी के बाद ठिकाने लगा दिया गया था। आरोप तो ये भी है कि सोहराबुद्दीन को रास्ते से हटाने के बाद अभय चूड़ास्मा ने खुद भी कई कारोबारियों को फोन करके धमकी दी कि या तो पैसे दे दो या फिर वो उन्हें सोहराबुद्दीन के कत्ल के इल्जाम में फंसा देगा।
सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का इकलौता और चश्मदीद गवाह तुलसी प्रजापति जोकि सोहराबुद्दीन के साथ ही उठाया गया था। लेकिन फिर उसे सोहराबुद्दीन एनकाउंटर में पुलिस का गवाह बनाकर छोड़ दिया गया था। बाद में राजस्थान पुलिस ने उसे किसी दूसरे मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। लेकिन जब ये मामला मीडिया में आया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केस सीआईडी के पास आया तो वंजारा और शाह घबरा गए। कहा जाता है कि उनको लगा कहीं प्रजापति मुंह न खोल दे। तो उसको भी ठकाने लगाने के लिए एनकाउंटर की कहानी रची गई। जांच के मुताबिक़ इसके लिए बनासकांठा को जगह के तौर पर चुना गया। बनासकांठा जिला जो एटीएस के अफसर वंजारा के क्षेत्र में आता था।
जांच के मुताबिक़ 27 दिसंबर 2006 को राजस्थान से गुजरात पेशी के लिए चाए जा रहे तुलसी प्रजापति को मार डाला गया था। और कहानी बनाई गई कि उसने अपने एक साथी के साथ मिलकर पुलिस पार्टी की आंखों में मिर्च पाउडर डाल दिया और गोलियां चलाईं, जवाबी गोलीबारी में वो मारा गया। लेकिन सीआईडी की जांच में पुलिस की ये कहानी झूठी साबित हुई थी।
इतना ही नहीं तुलसी प्रजापति और सोहराबुद्दीन के साथ उठाई गई कौसर बी कहां गई ये सवाल भी उठता रहा है। इसके लिए सीआईडी की आईजी गीता जौहरी की रिपोर्ट को देखना ज़रूरी है, जिसमें 26 नवंबर 2005 की उस सुबह का जिक्र था। कौसर बी को आख़िरी बार एक सफेद मारुति कार में सादी वर्दी वाले पुलिसवालों के साथ जाते देखा गया था। लेकिन जौहरी की रिपोर्ट कौसर बी पर ज्यादातर खामोश रही है। लेकिन सीबीआई को दिए पुलिस इंस्पेक्टर एन वी चौहान के बयान में इस राज़ से भी पर्दा उठा था। जिसके बयान में एटीएस के चीफ डी जी वंजारा का ज़िक्र है, एक फोन कॉल का ज़िक्र है और ये शक है कि वो फोन ख़ुद गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री यानि बीजेपी के मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह का था। आरोप है कि शाह चाहते थे कि कौसर बी को भी उसके पति की तरह ही ठिकाने लगा दिया जाए। सीबीआई को दिए पुलिस इंस्पेक्टर एन वी चौहान ने बताया था कि मेरे सामने डीजी वंजारा फॉर्म में बैठे थे कि उनका फोन बजा और जिस तरह से वो फोन करने वाले से बातें कर रहे थे, मुझे पता चल गया था कि ये खुद अमित शाह का फोन था। बयान के मताबिक़ पहले तो वंजारा ने शाह को ये भरोसा दिलाने की कोशिश की कि कौसर बी को लेकर उन्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि जल्द ही कौसर बी को वो या तो आंध्र पुलिस या फिर राजस्थान पुलिस के हवाले कर देंगे। सीबीआई को दिए पुलिस इंस्पेक्टर एन वी चौहान के बयान के मुताबिक़, उसके बाद वंजारा की जैसे बोलती बंद हो गई, वो चुपचाप दूसरी ओर से कही जा रही बातें सुनते रहे। बात ख़त्म होने पर वो मेरी ओर मुड़े और बोले कि अमित शाह कह रहे हैं कि कौसर बी का जिंदा रहना बेहद ख़तरनाक है।
हांलाकि फिलहाल अमित शाह को क्लीन चिट मिल गई कई और लोग बाहर आ गये हैं लेकिन आज भी कई लोग इस मामले में फंसे हैं। लेकिन इस मामले की गंभीरता या इस पर कथित दबाव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मामले की सुनवाई गुजरात के बजाय मुंबई भेजी गई। जहां सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ केस का मुकदमा मुंबई के सत्र न्यायालय में सीबीआई की विशेष अदालत में चल रहा था। इस दौरान मुबंई में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले के मुकदमे की रिपोर्टिंग तक पर पाबंदी लगा दी गई। यानि मीडिया को रिपोर्टिंग से रोक दिया गया। और इस पाबंदी लगाने के जज के फैसले को मुंबई के पत्रकारों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
इतना ही नहीं अदालत ने CBI की कार्यशैली पर कोर्ट ने सवाल उठाते हुए पूछा था सोहराबुद्दीन केस में निचली अदालत के आदेश को चुनौती क्यों नहीं दी गई थी?
लेकिन ताज़ा घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे विशेष सीबीआई न्यायाधीश बी.एच लोया की मौत की जांच की मांग करने वाली याचिका पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब दायर करने को कहा है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने बी एच लोया की मौत की स्वतंत्र जांच कराने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई की थी। इस सुनवाई के दौरान बंबई लॉयर्स एसोसिएशन ने कहा था कि उच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लिया हुआ है और उच्चतम न्यायालय को इन याचिकाओं की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह दिवगंत जज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखनी चाहती है। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से पोस्टमार्टम रिपोर्ट सौंपने को कहा है। इससे पहले गुरुवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने जज लोया की मौत की जांच पर तत्काल सुनवाई की मांग वाली महाराष्ट्र के पत्रकार बी आर लोन ने यह याचिका पर विचार किया था। जजों ने कहा कि संवेदनशील सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे लोया की रहस्यमयी मौत की निष्पक्ष जांच कराने की जरुरत है। आपको याद दिला दें कि इस मामले में कई पुलिस अधिकारियों और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का नाम भी सामने आया था। लोया की एक दिसंबर 2014 को नागपुर में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी।
हालांकि मुंबई में सीबीआई की विशेष अदालत ने गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री और वर्तमान में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को राहत देते हुए सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले में उनके खिलाफ लगे आरोप खारिज कर दिए हैं। दरअसल विशेष अदालत ने सीबीआई के सबूतों और दलीलों को मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं पाया था। लेकिन सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने इस फैसले के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट में जाने के साथ-साथ जज की शिकायत करने की बात कही थी।
हो सकता है कि आपको इतनी लंबी कहानी समझ में न आए लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा उठाए गये कुछ सवालों, एक के बाद एक मुठभेड़ों और जज लोया की मौत और अब उनके बेटे का ये कहना कि उनको कोई शिकायत नहीं जैसे मामलों पर गौर किया जाए तो कहानी फिल्मी भी लगती है और गंभीर भी…! जिससे पर्दा भले ही उठे या न उठे लेकिन सवाल बड़ा है और जवाब उससे भी गहरा…!

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आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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