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बीजेपी में जाने वाले कथित मुस्लिम नेताओं का संकट!

नई दिल्ली (1 अगस्त 2016)- भारतीय जनसंघ से जनता पार्टी के गलियारे से होते हुए भारतीय जनता पार्टी यानि बीजेपी तकmuslim politics का सफर तय करने वाली इस सियासी पार्टी को अक्सर मुस्लिम विरोधी नीतियों वाले दल के तौर पर कुछ लोग जानते हैं। लेकिन बावजूद इसके इसी पार्टी से कुछ मुस्लिम नाम रखने वाले लोग भी जुड़ते देखे गये हैं।
शुरुआती दौर में भले ही बीजेपी पूरे तौर पर वजूद में न आई हो और मुस्लिम समाज भी बीजेपी से ख़ासी दूरी बनाए रखता हो, लेकिन उस दौर में पार्टी के लिए कुछ लोगों ने अपना सब कुछ दांव पर लगाया और पार्टी से जुड़ने की नाराज़गी पर सिकंदर बख़्त नामी एक शख़्स को सिकंदर बदबख़्त तक कहा गया। लेकिन उस शख़्स की बीजेपी के प्रति वफादारी में कोई कमी न आई। जैसे तैसे पहली बार बीजेपी के अपने दम पर सरकार बनने का ख़्वाब पूरा हुआ और मात्र तेरह दिन बाद ही इस ख़्वाब की तेरहवीं भी हो गई। लेकिन बेचारे अपनी तमाम वफदारियों के बावजूद सिंकदर बख़्त बतौर अपनी वफादारी के ईनाम सरकार में कोई ओहदा न पा सके।
इसके बाद शहनवाज़ हुसैन और मुख़्तार अब्बास नक़वी से भी ज्यादा ज़ोर शोर से कई लोगों ने अपनी वफादारी का सबूत देने की नाकाम कोशिश की थी। उनमें कई ने तो अपने आप को वफादार साबित करने के लिए बाबरी मस्जिद तक को बतौर गिफ्ट हिंदु समाज को सौंपने की बात तक कह डाली थी। चाहे आरिफ साहब हों या फिर कोई और लेकिन उनको शायद किसी साइज़ के ब्रीफकेस के अलावा तोहफे में कोई सियासी फायदा आजतक नहीं देखा गया। बेचारे अपनों से भी गये और महबूब के भी न हो सके।
बहरहाल आज भी कई कथित मुस्लिम नाम बीजेपी की वफादारी से ओतप्रोत देखे जा रहे हैं। कई तो तिलक वग़ैरा भी लगाकर ख़ुद को सर्टिफाइड कराने की होड़ में जुटे हैं। मगर उनके लिए राजनीति से ज्यादा पार्टी में वफादारी के नाम पर हर रोज़ एक नया पर्चा हल करने जैसा इम्तिहान जारी है। कुछ कांवड़ की सेवा करके तो कुछ कहीं हवन हो तो वहीं बैठ कर अपने को अल्ट्रासैक्यूलर और भाजपाई होने का सबूत देते देखे जाते हैं।
लेकिन क्या इतनेभर से बीजेपी संतुष्ट हो जाएगी और इन बेचारों को अपना नेता तो क्या वफादार ही मान लेगी? इस बारे में इतिहास को भुलाकर कुछ नये रंगरूटों से जब बात करने की कोशिश की गई तो पार्टी अनुशासन के नाम पर उनकी तो मानो घिग्घी ही बंध गई बेचारे बोलने तक की हिम्मत नहीं कर सके। कुछ ने कहा कि जब कांग्रेस और सपा धोखा देती है तो बीजेपी से ही क्या शिकायत। बहराहल उनका सियासी पैमाना भी ठीक ही है। क्योंकि जिसकी तीन आदमी पहले ही जेब काट चुकें हो तो भला चौथे के ख़िलाफ किस थाने में एफआईआर कर सकता है।
लेकिन ये सवाल अपनी ही जगह खड़ा है कि अपने समाज या अपने परिवार की भलाई के नाम पर बीजेपी में जाने वाले कथित मुस्लिम नाम वाले लोग हर रोज़ नया इम्तिहान देकर सिर्फ इंतज़ार ही करते रहेगें या कभी उनकी वफादारी का रिज़ल्ट भी आउट हो पाएगा।
क्योंकि कभी सुप्रीमकोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए बाबरी मस्जिद की शहादत, तो कभी गुजरात में सरेआम क़त्लेआम, कभी लव जिहाद तो कभी गऊ रक्षा, कभी बिसाहड़ा, तो कभी कैराना का पलायन तो कभी कुछ, लेकिन सवाल ये उठता है कि बीजेपी जब मुस्लिम विरोधी इन मुद्दों को तय करती है तो क्या ये कथित मुस्लिम नाम वाले भाजपाई वहां मौजूद होते भी हैं या उनकी इतनी भी हैसियत नहीं कि ये लोग मशविरे में भी बैठाए जा सकें। और अगर ये सब कुछ इनके सामने तय होता है तो फिर इसका विरोध न कर पाने के पीछे इनकी क्या मजबूरी होती है। ये अलग बात है कि जब तक अपना झंड़ा और ऐजेंडा वाली कोई सियासी जमात न हो तब तक इन जैसो की ग़ुलामी एक मजबूरी भी कही जा सकती है।
(लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं, सहारा समय, डीडी आंखों देखी,इंडिया टीवी. इंडिया न्यूज़, वॉयस ऑफ इंडिया समेत कई राष्ट्रीय चैनलों में महत्पूर्ण पदों पर कार्य कर चुकें हैं।)

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आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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